1 मूढ़ अपने मन मे कहलन , "केहु परमेश्वर हव ही नाही । " उ बिगड़ गईलन , उ सब कुटिलता क घिनौना काम कईले हयन ; केहु सुकर्मी नाहि । 2 परमेश्वर स्वर्ग पे से मनुष्य के ऊपर दृष्टि कइलन ताकि देखअ कि केहु बुद्धि से चलअवाला या परमेश्वर के पूछेवाला हव कि नाही । 3 उ सब क सब हट गइलन ; सब एक साथ बिगड़ गइलन ; केहु सुकर्मी नाहि , एक भी नाही । 4 का उ सब अनर्थकारियन के कऊनो ज्ञान नाहि जवन हमरे लोगन के रोटी के समान खालन परमेश्वर क नाम नाहि लेलन ? 5 उहाँ ओनकरे पे भय छा गयल जहाँ भय क कऊनो कारण ना रहल । काहे कि यहोवा ओनके हड्डीयन के , जवन तोहरे विरुद्ध छावनी डालल पड़ल हयन , तितर-बितर कर देहलअ; तू त ओनके लज्जित कर देलअ एहि से परमेश्वर ओनके निकम्मा ठहरइले हयन । 6 भला होत कि इस्त्राएल क पूरा उद्धार सिय्योन से निकलत ! जब परमेश्वर अपने प्रजा के बन्धुआई से लऊटा ले अइहन । तब याकुब मगन अऊर इस्त्राएल खुश होइहन ।